रक्सौल, पूर्वी चंपारण।
जीवन केवल साँसों के चलने का नाम नहीं है, बल्कि स्वयं को समझने, परिस्थितियों से सीखने और सही निर्णय लेने की कला है। जीवन में सफलता और शांति उसी व्यक्ति को मिलती है, जो समय के साथ अपनी सोच बदलना जानता है और कठिन परिस्थितियों में भी अपने विवेक का साथ नहीं छोड़ता।
जिंदगी भी एक गाड़ी की तरह है। रास्ते और परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिए समय के अनुसार अपनी गति और दिशा बदलना जरूरी है। कभी तेज चलना पड़ता है, तो कभी धैर्य से आगे बढ़ना होता है। समझदारी इसी में है कि हम परिस्थितियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उनका सामना करना सीखें।
मन की भूख का कोई अंत नहीं, इसलिए संतोष और संयम जरूरी है। भोजन से शरीर की भूख मिट सकती है, लेकिन इच्छाओं का अंत केवल अधिक पाने से नहीं होता। मनुष्य जितना अधिक पाने की दौड़ में भागता है, उतना ही बेचैन हो सकता है। सच्चा सुख वस्तुओं की अधिकता में नहीं, बल्कि संतोष, आत्मविश्वास और मन की शांति में छिपा है।
जीवन में नकारात्मक विचारों को स्थान देने के बजाय सकारात्मक सोच को अपनाना चाहिए। निराशा हमें कमजोर बनाती है, जबकि उम्मीद हमें आगे बढ़ने की ताकत देती है। जब जीवन कठिनाइयों के समुद्र में उतरता है, तब समय और अनुभव हमें संघर्ष करना सिखाते हैं। जो व्यक्ति मुश्किलों से सीखता है, वही अपने भीतर छिपी क्षमता को पहचान पाता है।
संघर्ष जीवन की परीक्षा है और कर्म उसकी पहचान। इतिहास गवाह है कि कठिनाइयों का सामना करने वाले लोग ही अपनी मेहनत से नई राह बनाते हैं। इसलिए असफलता से निराश होने के बजाय उससे सीखना चाहिए। हर ठोकर हमें संभलने का अवसर देती है और हर चुनौती हमारे भीतर नई शक्ति जगाती है।
जीवन को सुंदर बनाने के लिए अच्छे विचारों के साथ अच्छे संस्कार भी जरूरी हैं। श्रद्धा से ज्ञान मिलता है, नम्रता से सम्मान और योग्यता से उचित स्थान। जब इन गुणों के साथ ईमानदारी और सेवा की भावना जुड़ जाती है, तब व्यक्ति समाज में अपनी अलग पहचान बनाता है।
दूसरों के व्यवहार से भी जीवन में बहुत कुछ सीखने को मिलता है। अक्सर कहा जाता है कि जो जैसा व्यवहार करे, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। लेकिन किसी की बुराई के कारण अपनी अच्छाई छोड़ देना समझदारी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति कटु वचन बोलता है, तो जरूरी नहीं कि हम भी अपनी भाषा और संस्कार खो दें। काँटे अपना स्वभाव नहीं छोड़ते, तो फूल अपनी खुशबू क्यों छोड़ें?
दूसरों की बुराई को अपने चरित्र का हिस्सा मत बनने दीजिए। किसी का गलत व्यवहार उसकी सोच को दिखाता है, जबकि हमारा व्यवहार हमारे संस्कारों को प्रकट करता है। इसलिए विरोध का उत्तर हमेशा विरोध से देना जरूरी नहीं। कई बार शांत रहना, मर्यादा बनाए रखना और सही रास्ते पर चलते रहना ही सबसे बड़ा उत्तर होता है।
यह भी सच है कि संसार में प्रशंसा और आलोचना दोनों मिलेंगी। कुछ लोग आपकी अच्छाइयों की सराहना करेंगे, तो कुछ लोग बिना कारण आलोचना भी करेंगे। यदि हम हर व्यक्ति की बात से प्रभावित होकर अपना रास्ता बदलने लगें, तो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे। इसलिए यह देखना अधिक जरूरी है कि हम जो कर रहे हैं, वह सही है या गलत।
निंदा से घबराना नहीं चाहिए और प्रशंसा से अहंकारी नहीं बनना चाहिए। प्रशंसा सुनकर अपनी कमियों को भूल जाना और आलोचना सुनकर स्वयं पर विश्वास खो देना, दोनों ही नुकसानदायक हैं। दूसरों की बातों को विवेक की कसौटी पर परखें। जो बात सही हो, उसे स्वीकार करें और जो गलत हो, उसे शांत मन से छोड़ दें।
जीवन में सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वयं के प्रति है। अपने विचारों, शब्दों और कर्मों का हिसाब हमें स्वयं रखना चाहिए। ऐसे कर्म करें, जिनका बोझ जीवन के अंतिम पड़ाव पर पछतावे के रूप में न उठाना पड़े। किसी का दिल दुखाने के बजाय उसे सहारा देना, स्वार्थ के बजाय सेवा को महत्व देना और अधिकार के साथ कर्तव्य निभाना ही जीवन की सच्ची कमाई है।
अंततः जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करने की जिम्मेदारी हमारी अपनी है। परिस्थितियाँ हमारे सामने चुनौतियाँ रख सकती हैं, लोग हमारी आलोचना कर सकते हैं और समय हमारी परीक्षा ले सकता है, लेकिन इन सबके बीच सही निर्णय लेने की शक्ति हमारे विवेक में ही होती है।
जीवन का सार यही है कि स्वयं को समझें, दूसरों को समझने का प्रयास करें और हर परिस्थिति में अपने अच्छे संस्कार बनाए रखें। मुस्कराते हुए आगे बढ़ें, कर्म करते रहें और अपने व्यवहार से ऐसी पहचान बनाएँ, जिस पर स्वयं को भी गर्व हो और दूसरों को भी प्रेरणा मिले।
क्योंकि जीवन हमारा है, रास्ता भी हमें चुनना है और अपने कर्मों से उसका भविष्य भी हमें ही बनाना है।








